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Wednesday, December 15, 2010

चतुर लोमड़ी

                       एक कौवा था. एक दिन उसे कहीं से रोटी का एक टुकड़ा मिल गया. उसे चोंच मैं दबा कर वह एक पेड़ की  डाल  पर बैठ गया. एक चतुर लोमड़ी ने उसे देख लिया. पेड़ के पास जाकर उसने कौवे से कहा - "हे कौवे! भैया तुम कितना मधुर गाते हो. बहुत दिनों से तुम्हारी मधुर आवाज़ सुनना चाहती हूँ. कुछ गाकर सुनाओ न."


                     अपनी प्रशंसा सुनकर कौवा फूला नहीं समाया.वह ख़ुशी से कांव - कांव करने लगा.  ख़ुशी से कांव- कांव करने लिए उसने जैसे ही अपना मुह खोला, रोटी का टुकड़ा नीचे जमीन पर गिर गया. लोमड़ी ने झट से रोटी का टुकड़ा उठाया और खुश होती हुयी जंगल में भाग गयी.कौवा पछताता ही रह गया.

Saturday, December 11, 2010

चतुर कौवा


एक कौवा था. वह नदी के किनारे एक पेड़ पर रहता था. उसी पेड़ पर एक सांप भी रहता था. सांप हमेशा कौवे के अंडे निकल कर खा जाता था. अतः कौवे की समझ में यह नहीं आ रहा था कि वह किस प्रकार अपने अन्डो की रक्षा करे.


एक दिन एक राजकुमारी नहाने के लिए नदी के किनारे पर आई. नदी किनारे अपने आभूषण रख कर वह नहाने चली गयी. कौवे को उसी समय एक उपाय सूझा. वह उदा और एक आभूषण लेकर पेड़ पर लौट आया. उसने उस आभूषण को सांप के बिल मैं रख दिया. राजकुमारी के रक्षक कौवे को आभूषण ले जाता देखकर उसके पीछे भागे. जब वे पेड़ के पास पहुंचे तो उन्होंने वहां सांप देखा. रक्षकों ने अपने भालों से सांप को मार डाला और उसके बिल मैं रखे आभूषण लेकर चले गए. कौवा बहुत प्रसन्न हुआ. उसने चतुराई से सांप से हमेशा के लिए छुटकारा पा लिया.